मेरी पहली केदार यात्रा – पहला पड़ाव(4)

मेरी पहली केदार यात्रा – पहला पड़ाव(4)

एक बार दीदी बोली , कैसा यह सफर होता है। नए नए लोग मिलते है उनका भी एक जीवन क्रम होता है। मुझे मैट्रिक्स मूवी की याद आ रही थी। कैसे विश्व को बनाने वाला लोगों के जीवन को प्रोग्राम करता है।

सहारनपुर : The Oasis Hotel 11th May

जैसे हम एयरपोर्ट से उतरे तो किसी ने बोला सामने ही एयरपोर्ट मेट्रो स्टेशन है। हमने जाने का रास्ता पूछा और हम मेट्रो स्टेशन के लिए चल पड़े। आधे रास्ते में ही टैक्सी वालो ने हमें गाइड और मिस गाइड दोनों ही किया।  हम हिचके, वापस अपने टर्मिनल लौटे और फिर सोचा , नहीं साइन बोर्ड देखते हुए चलो चलते है।  जैसे ही दूसरे टर्मिनल पर पहुंचे तो ईश्वर की कृपा थी अचानक मुझे कश्मीरी गेट जाने वाली एसी बस दिखी।  मैंने दीदी से बोला रात का समय है, हम इससे नई दिल्ली पहुँच सकते है। यह हमें आराम से पहुँचा देगी।  

और फिर पता नहीं क्या अचानक सूझा और हम बस में बैठ गए। सारे टर्मिनलो का चक्कर लगाते हुए यह लाल डब्बा बस हमें नयी दिल्ली ले ही आयी। वो भी शायद बहुत कम समय में। और बीच में तो मेरी आँख भी लग  गई थी।  

बस ने हमें अजमेरी गेट साइड छोड़ा और हम चलते हुए, सिक्योरिटी चेक को पार करते हुए अजमेरी गेट से लेकर पन्द्रह सोलह प्लेटफार्म जिक-जैक पैदल पुल से आखिरकार पहाड़ गंज साइड वाले एसी वेटिंग रूम में पहुँच गए। 

६० रूपये तीन घंटे के लिए। रिसेप्शनिस्ट ने कहा। ओके। और हमने अपने लिए एक कोने में बैठने की जगह ढूंढ ली। वेटिंग रूम में ही फ़ास्ट फ़ूड की शॉप भी थी।  चाय पी कोल्ड ड्रिंक पिया और थोड़ा आराम किया। पहले बैठने की जगह मिली और आखिर के घंटे में लेटने की भी जगह मिल ही गयी। 

वेटिंग रूम पूरी तरह से भरा था।  लोग सीटों पर सोये हुए थे , बैठे हुए थे , सामान रखा था। और सामने दीवार पर ८०-९०  दशक के हिंदी फ़िल्मी सांग्स एक केबल टेलीविजन पर चल रहे थे।  मै उसी में रम गया।  चूँकि मै अपने सामान को लेकर बहुत सतर्क था। खासकर नई दिल्ली स्टेशन पर। इसलिए सोया नहीं।

जिस बेबी का शायद कुछ दिन पहले ही जन्म हुआ हो , से लेकर जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुंचे सब लोग थे।  उस वेटिंग रूम में।  सब अपने डेस्टिनेशन पर जाने के लिए माध्यम अथार्त ट्रेन का वेट कर रहे थे।  

ट्रेन को शायद यूँही भारत की लाइफलाइन न बोलते हैं। वास्तव में भारत की ट्रेन और उसके स्टेशन इनका भी एक दर्शन है।

आखिरकार तीन घंटे बीत ही गए और हम अजमेरी गेट साइड देहरादून शताब्दी का वेट करने लगे। आराम से सीट मिल गयी। आराम से थोड़ा सोये शताब्दी ट्रैन का वही पुराना मेनू वाला ब्रेकफास्ट किया। थोड़ा बाहर वही गन्ने के खेत देखते हुए , कभी चीनी मिल देखते हुए। वही पुराने स्टेशनों को देखते हुए अपनी याद ताज़ा करते रहे।  ट्रेन भी हमें  यादों की महफ़िल से ग़ाज़ियाबाद मेरठ मुजफ्फरनगर देवबन्द चैप्टर को एक के बाद एक करके गुज़ारती रही और आखिर में मुझे मेरे जन्म स्थान  सहारनपुर में लाकर छोड़ दिया। 

वही सहारनपुर जिसके कभी एक कोने में मेरा घर था तो दूसरे कोने में  मेरा स्कूल।  घर से स्कूल जाते जाते करीब करीब सारे पुराने मोहल्ले कवर हो जाते थे। 

मेरा एक डॉक्टर दोस्त है, आजकल वो दिल्ली में ऑर्थोपेडिक डॉक्टर है।  एक बार उसने मुझे बताया था, बचपन में, कि कुत्ते भी अपना एक एरिया बनाकर उस पर राज करते हैं।  इसलिए एक मोहल्ले के कुत्ते दूसरे मोहल्ले के कुत्तो पर या एक गली के कुत्ते दूसरे गली के कुत्तो पर खूब भोंकते है। मै बचपन से बहुत बहानेबाज था।  एक बार मैंने इसी थ्योरी पर देर से घर आने का बहाना बनाया की, कैसे दाल मंडी पुल के कुत्ते खुमरान पल के कुत्तो से लड़ गए और हमारी मैन्युअल रिक्शा कैसे एक जाम में फंस गयी। आज भी मेरी माँ मेरी उस मासूमियत का बखान गहे बगाहे कर देती हैं। 

पर बचपन बचपन होता है।  मासूमियत भरा। उसी के लिए मै आया था।  स्कूल भी देख लेंगे और कुछ गलियां भी फिर से।  पर समय चक्र बलवान होता है जरुरी नहीं जो हम सोचे वही हो। मुझ जैसे भूतकाल में रहने वाले जीव के मुँह पर समय ने ऐसा तमाचा मारा कि मेरा मन एक बार को रोने का हुआ।  लेकिन जल्द ही मैंने अपने आप को संभाला।  हाँ लेकिन मेरे विचार है कुछ, जो मुझे लगता है की हम सब को सोचना चाहिए।

तो आखिरकार सहारनपुर पहुँच ही गए। जैसे ही ट्रेन से उतरे सामने से एक बहुत ही परचित से इंसान सामने खड़े हुए  हमारा इंतज़ार कर रहे थे।  उनकी हँसी आज भी वैसी  थी जैसा हम छोड़ कर गये थे। कौन थे वो? और सहारनपुर में क्या हुआ? कैसे यात्रा का एक पड़ाव  पूरा हुआ।

 यात्रा शायद ऐसे ही की जानी चाहिए – पड़ाव लेते हुए।  एक एक पल को जीते हुए। सब कुछ बताऊंगा और यह भी बताऊंगा कि मैंने अपने ट्रैकिंग बैग में क्या क्या पैक किया था।  मुझे लगता है हमने बहुत सही सही  चीज़े रखी थी। लेकिन क्या मिस हो गया बताऊंगा। अगली पोस्ट में। 

पिछला पोस्ट : मेरी पहली केदार यात्रा – क्यों

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